स्किनर का क्रिया प्रसूत अधिगम सिद्धान्त (OPERANT CONDITIONING THEORY OF SKINNER)
"क्रिया प्रसूत अनुबंधन का सिद्धांत" या "क्रिया-प्रसूत अधिगम सिद्धान्त" "सक्रिय अनुकूलन का सिद्धांत के प्रवर्तक अमेरिकी मनोवैज्ञानिक बी०एप स्कीनर थे।
मनो वैज्ञानिको ने 'अनुबंधन' को दो वर्गों में बांटा है।
(1) क्लासिकी अनुबंधन। (2) साधनात्मक अनुबंधन।
‘क्लासिकी अनुबंधन’ से रूसी मनोवैज्ञानिक इवान० पी० पावलव का सम्बन्ध है। जबकि “साधनात्मक अनुबंधन" का सम्बन्ध-थार्नडाइक और वी०एफ स्कीनर है।
स्किनर द्वारा प्रतिपादित अधिगम के सिद्धान्त को कार्यात्मक अनुबन्धन (Operant Conditioning) कहते हैं।
प्रोफेसर स्किनर हावर्ड विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के प्रोफेसर थे। उन्होंने व्यवहार का व्यवस्थित एवं वस्तुनिष्ठ अध्ययन करने के लिये एक यन्त्र विकसित किया तथा अवलोकन की विधि का चयन किया।
स्किनर एक व्यावहारिक मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने चूहे तथा कबूतरों की विभिन्न सहज क्रियाओं पर अनेक प्रयोग किये। अन्त में उन्होंने खाने की क्रिया को अध्ययन का विषय माना क्योंकि यही सबसे अधिक साधारण क्रिया थी और थोड़े समय में इसके सम्बन्ध में अधिक तथ्य एकत्रित किए जा सकते थे। व्यवहार के अध्ययन की यह विधि बाद में इतनी लोकप्रिय हो गई कि अनेक अमेरिका मनोवैज्ञानिक उसका प्रयोग करने लगे।
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक वी०एफ० स्कीनर ने अपनी पुस्तक (The behaviour of Organism) में सीखने के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है।
स्किनर का प्रयोग
वी०एफ० स्कीनर ने क्रिया-प्रसूत अनुबंधन का प्रतिपादन करने के लिए "चूहा” तथा “कबूतरों" पर अनेक प्रयोग करते है। जिसमें 'चूहा' पर किया गया प्रयोग, मुख्य प्रयोग माना जाता है।
स्किनर ने कार्यात्मक अनुबन्धन का अध्ययन करने के लिये अपनी विधि तथा उपकरण का विकास किया। उन्होंने एक समस्यावादी बॉक्स का निर्माण किया जिसको किना बॉक्स कहते हैं। व्यवहार का अल्प समय में तथा वैषयिक ढंग से अध्ययन करने की दृष्टि से इस उपकरण का निर्माण किया गया। इसमें एक लीवर रखा गया जिसको दबाने की अनुक्रिया को व्यवहार की एक इकाई माना गया। इस बॉक्स में एक चूहा रखा गया जो भूखा था। उस बॉक्स में यह व्यवस्था थी। कि लीवर के दबने पर भोजन की प्लेट निकलकर सामने आती थी। चूहे की गतियों का विद्युत उपकरण की सहायता से रिकार्ड रखा गया।
स्किनर का कार्यात्मक सिद्धान्त थार्नडाइक के नियम के अंतर्गत चयन एवं संयोजन पर आधारित है। थार्नडाइक की भाँति स्किनर ने दो प्रकार के अधिगम को स्वीकार किया। किन्तु गुथरी की भाँति उसने उस अधिगम पर अधिक बल दिया जो परिणामों द्वारा नियन्त्रित होता है। स्किनर ने व्यवहार को दो भाग बाँटा है
(1) अनुक्रियात्मक (Respondent)
(2) कार्यात्मक (Operant)
परम्परागत मनोविज्ञान के अनुसार उद्दीपन के अभाव में अनुक्रिया नहीं होती है। स्किमर में अनुक्रिया को दो भागों में बाँटा है
(i) प्रकाश में आने वाली अनुक्रिया (Elicited Response)
(ii) उत्सर्जन प्रतिक्रिया (Emitted Response)
जो अनुक्रियाएँ ज्ञात प्रेरक द्वारा प्रकाश में लाई जाती है. उनको प्रकाशित अनुक्रिया कहते हैं। इसक विपरीत दूसरे प्रकार की अनुक्रियाएँ होती है जिनका सम्बन्ध किसी ज्ञात प्रेरक से नहीं होता है। इस प्रकार की उत्सर्जन अनुक्रिया को कार्यात्मक (Operant) कहते हैं जबकि परम्परागत विचारधारा यह है कि इस प्रकार की अनुक्रियाओं को भी प्रकाशित अनुक्रिया मानो चाहे उसका उत्तेजक भले ही अज्ञात है किन्तु स्किनर का विचार है कि कार्यात्मक व्यवहार को समझने के लिये उत्तेजक दशाओं का कोई महत्त्व नहीं है क्योंकि कार्यात्मक व्यवहार उत्तेजक द्वारा प्रकाश में नहीं आता है। सक्रियता का किसी पूर्व उत्तेजक के साथ सम्बन्ध हो सकता है। ऐसी स्थिति में यह विभेदीकृत कार्यात्मक (Descriminated Operant) हो जाता है।
दो प्रकार के अनुबन्धन - अनुक्रिया की भाँति अनुबन्धन भी दो प्रकार के होते हैं
(i) उद्दीपक अनुबन्धन (Stimulus conditioning)
(ii) अनुक्रिया अनुबन्धन (Response conditioning)
संक्षिप्त रूप में प्रथम प्रकार को S तथा दूसरे प्रकार को R अनुबन्धन कहा जाता है। S प्रकार के अनुबन्धन का सम्बन्ध अनुकियात्मक व्यवहार से इस कारण होता है कि पुनर्बलन का सम्बन्ध उत्तेजक से होता है। पावलव का अनुबन्धन सम्बन्धी सिद्धान्त S प्रकार का ही है क्योंकि इसमें अनुबन्धित उत्तेजक (घण्टे की आवाज) अनुबन्धन रहित उत्तेजक (भोजन) के साथ प्रस्तुत किया जाता है जिससे लार टपकने की अनुक्रिया प्रकाश में आती है। इसी को अनुबन्धित प्रतिक्रिया कहते हैं। स्किनर S प्रकार के सीखने को अधिक महत्त्व नहीं देता है।
स्किनर के विचार से R प्रकार का अनुबन्धन अधिक महत्त्वपूर्ण है। यह अनुबन्धन कार्यात्मक व्यवहार का अनुबन्धन तथा पुनर्बलन के साथ सम्बन्धित होता है। यह एक प्रकार की प्रतिक्रिया है जो पुनर्बलन से सम्बन्धित होती है, न कि उद्दीपन के साथ इस विचार की पुष्टि के लिये स्किनर ने लीवर दबाने का उदाहरण दिया। लीवर दबाने की प्रतिक्रिया को भोजन प्रस्तुत करके पुष्ट किया जाता है। सक्रिय अनुबन्धन में प्रमुख बात यह है कि प्रबलन उस समय सम्भव होता है जबकि प्रतिक्रिया का में उत्सर्जन होता है। R प्रकार में प्रचलन का सम्बन्ध प्रतिक्रिया के साथ होता है। जबकि S प्रकार के पुनर्बलन का सम्बन्ध उद्दीपन के साथ होता है। R प्रकार के दो नियम S प्रकार के दो नियमों की भाँति नहीं हैं। ये नियम इस प्रकार हैं
(1) अनुबन्धन का नियम
(2) बहिर्गमन का सिद्धान्त।
R प्रकार के अनुबन्धन नियम की तुलना थार्नडाइक के प्रभाव के नियम से की जा सकती है। अनुबन्धन नियम के बारे में स्किनर ने लिखा है, "यदि एक कार्यात्मक (Operant) के घटित होने का अनुसरण एक पुनर्बलन उत्तेजक के प्रस्तुतीकरण के साथ होता है तो शक्ति में वृद्धि होती है।
यहाँ ध्यान देने की बात है कि प्रबलन परिस्थिति उत्तेजक द्वारा व्यक्त की गई है। इस ने प्रणोदन में कमी अथवा परिणामों के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है। स्किनर ने स्पष्ट किया है कि जो शक्ति प्राप्ति होती है वह उत्तेजक प्रतिक्रिया सम्बन्ध के कारण नहीं होती क्योंकि सक्रिय को किसी प्रकार की उत्तेजना की आवश्यकता नहीं होती है।
क्रिया प्रसूत अनुबंधन का शिक्षा में महत्व (Imporatance of Operant Conditioning in Education)
1. इसका प्रयोग बालकों के शब्द भण्डार में वृद्धि के लिए किया जाता है।
2. शिक्षक इस सिद्धान्त के द्वारा सीखे जाने व्यवहार को स्वरूप प्रदान करता है, वह उद्दीपन पर नियन्त्रण करके वांछित व्यवहार का सृजन कर सकते हैं।
3. इस सिद्धान्त में सीखी जाने वाली क्रिया को छोटे-छोटे पदों में विभाजित किया जाता है। शिक्षा में इस विधि का प्रयोग करके सीखने में गति और सफलता दोनों मिलती है।
4. स्किनर का मत है, जब भी कार्य में सफलता मिलती है, तो सन्तोष प्राप्त होता है। यह क्रिया को बल प्रदान करता है।
5. इसमें पुनर्बलन को बल मिलता है। अधिकाधिक अभ्यास द्वारा क्रिया को बल मिलता है।
6. यह सिद्धान्त जटिल व्यवहार वाले तथा मानसिक रोगियों को वांछित व्यवहार के सीखने में विशेष रूप से सहायक होता है। दैनिक व्यवहार में हम इस सिद्धान्त का बहुत प्रयोग करते हैं।
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