सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS AFFECTING LEARNING PROCESS)

 अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक (FACTORS AFFECTING LEARNING PROCESS)


अधिगम की प्रक्रिया अनेक कारकों से प्रभावित होती रहती है। अधिगम की क्रिया किसी विशेष प्रतिकारक के प्रभाव से संचालित नहीं होती। उसकी संचालन प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले अनेक कारक होते हैं। किसी ज्ञान तथा क्रिया को सीखने के लिये प्रतिकारकों की उचित व्यवस्था अति आवश्यक होती है। ये प्रतिकारक निम्नवत् हैं।


1. बालक का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य (Physical and Mental Health of Child) स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का विकास होता है। यह उक्ति काफी महत्वपूर्ण है। शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ व परिपक्व बालक सीखने में रुचि लेते हैं तथा वे शीघ्रता से नवीन तथ्यों को सीख लेते है। इससे विपरीत कमजोर, अस्वस्थ बालक शारीरिक व मानसिक कठिनाई होने के साथ सीखने में कठिनाई का अनुभव करते हैं। छोटी कक्षाओं में पढ़ने वाले बालकों के लिये शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य का विशेष प्रयास परिलक्षित होता है। मानसिक रूप से स्वस्थ व परिपक्च बालकों में सीखने की क्षमता तीव्र होती है। बुद्धिमान तथा तीव्र बुद्धि वाले छात्र कठिन बातों को शीघ्रता तथा सरलता से सीख लेता है। मानसिक रोग से पीड़ित या कम बुद्धि वाले बालक मन्दगति से तथा कई प्रयास के उपरान्त नवीन बातों को सीख पाते हैं।


बड़ी कक्षाओं के छात्रों को सीखने में उनकी बुद्धि तथा मानसिक स्वास्थ्य का विशेष महत्व होता है।


2. परिपक्वता (Maturity)


परिपक्वता बालक को सीखने में काफी योगदान करती है। परिपक्व बालक सीखने में विशेष रुचि लेते हैं। वे नवीन तथ्यों तथा परिलताओं को अल्प समय में सीख लेते हैं। जबकि अपरिपक्च बालक उसी तथ्यों को काफी विलम्ब से तथा विशेष प्रयासों के पश्चात् ग्रहण कर पाते हैं।


3. अधिगम की इच्छा (Will to Learn)


बालक की इच्छा किसी भी विषय को समझने में काफी महत्वपूर्ण होती है। अधिगम किसी भी व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर होता है। यदि बालक को किसी विषय को सीखने की प्रबल इच्छा होती है तो वह प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उस बात को सीख लेता है। जबकि इसके विपरीत यदि कोई बालक किसी तथ्य को सीखने में रुचि नहीं ले रहा है तो उसे अनुकूल परिस्थिति होते हुये भी नहीं सिखाया जा सकता है।


इसलिये अध्यापक, अभिभावकों द्वारा बालकों में वृढ़ इच्छा शक्ति उत्पन्न कराई जानी चाहिए


 प्रेरणा (Motivation)


सीखने की प्रक्रिया में प्रेरणा का मुख्य योगदान रहा है। बालक को यदि किसी कार्य के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है तो वह सीखने की क्रिया में रुचि नहीं लेगा। अध्यापक को चाहिये यह पाठ्य वस्तु पढ़ाने से पूर्व छात्रों को उस विषय में प्रेरणा दे तो बालक उस पाठ में अधिक सफलता प्राप्त कर सकेगा। प्रेरणा से छात्रों में महत्वाकांक्षा उत्पन्न होती है। प्रशंसा व प्रोत्साहन के द्वारा तथा प्रतिद्वन्द्रिता व महत्वाकांक्षा की भावना उत्पन्न करके बालकों को प्रेरित कर अधिगम कराया जा सकता है।


5. विषय सामग्री का स्वरूप (Nature of Subject Material)


अधिगम की प्रक्रिया पर विषय सामग्री के स्वरूप का भी प्रभाव पड़ता है। विषय सामग्री की व्यक्तिगत उपयोगिता भी सीखने में महत्वपूर्ण योगदान करती है। यदि सीखने वाली विषय सामग्री बालक के लिए व्यक्तिगत उपयोग तथा महत्व रखती है तो बालक उसे सरलता से सीख लेता है।


छात्र तथा अध्यापक के होते हुये भी कोई किया उस समय तक नहीं सिखायी जा सकती है जब तक यह ज्ञात न हो कि अध्यापक को क्या सिखाना है ? क्या सिखाना ही पाठ्यक्रम या विषय वस्तु है? विद्यालय में जो सिखाया जाता है, वह पाठ्यक्रम होता है। पहले पाठ्यक्रम का रुचि प्राय पुस्तकों से समझा जाता था। अब खेलकूद, भ्रमण, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि पाठ्यक्रम का अंग बन गये है। 


6. वातावरण (Atmosphere)


अधिगम वातावरण से अधिक प्रभावित होता है। वातावरण बाहा हो या आन्तरिक घर का हो या समुदाय का विद्यालय का हो या कक्षा का अधिगम का वातावरण ठीक है तो क्रिया सीखने में कठिनाई नहीं होगी। कक्षा में प्रकाश, वायु का प्रबन्ध सफाई आदि बाह्य वातावरण की सृष्टि करते हैं। शान्त सुविधाजनक, नेत्रप्रिय, उचित प्रकाश के वातावरण में बालक प्रसन्नता से व एकाग्रचित्त होकर सीखता है। इसके विपरीत शोरगुल वाले आनाकर्षक तथा असुविधाजनक वातावरण में बालक में सीखने की प्रक्रिया मन्द हो जाती है। बालक जल्दी ही थकान का अनुभव करने लगता है। विषय वस्तु उबाऊ एवं बोझ युक्त प्रतीत होने लगती है। छात्रों को किसी भी क्रिया या ज्ञान के सीखने के लिये यह आवश्यक है कि वे मानसिक रूप से तैयार हो अर्थात् अध्यापक को चाहिए कि वह उनके लिये मनोवैज्ञानिक परिस्थिति उत्पन्न करे।


7. शारीरिक एवं मानसिक थकान (Physical and Mental Fatigue)


बालक की शारीरिक व मानसिक थकान सीखने की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करती है। थकान की स्थिति में बालक पूर्ण मनोयोग से सीखने की क्रिया में रत नहीं हो पाता है तथा उसका ध्यान विकेन्द्रित होता रहता है, जिससे सीखना संदिग्ध हो जाता है। प्रातः काल बालक स्फूर्ति युक्त रहते हैं जिसके कारण बालक प्रातःकाल बालक को सीखने में एकाग्रता व सुगमता रहते हैं। धीरे-धीरे बालकों की स्फूर्ति में शिथिलता आ जाती है। जिसके कारण बालकों की सीखने की गति मन्द हो जाती है। अतः बालकों के हने की समय सारणी बनाते समय विश्राम की व्यवस्था रखने का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। जिससे छात्र विश्राम कर पुनः मानसिक व शारीरिक रूप से तैयार होकर सीखने की क्रिया में पुनः मनोयोग से रत हो सके।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

शिक्षण नवीन विधाएँ (उपागम)।बाल-केन्द्रित शिक्षण उपागम।क्रिया/गतिविधि आधारित शिक्षण

शिक्षण नवीन विधाएँ (उपागम) [New Approaches of Teaching] हेल्लो दोस्तों आज हम बात करेंगे शिक्षण नवीन विधाएँ (उपागम) से सम्बन्धित बाल-केन्द्रित शिक्षण उपागम क्या है , इसकी विशेषताएँ , बाल-केंन्द्रित शिक्षण का महत्त्व तथा क्रिया/गतिविधि आधारित शिक्षण क्या है ,गतिविधियों पर आधारित शिक्षण विधि , गतिविधि आधारित शिक्षण विधि (क्रियापरक विधि) के प्रकार , गतिविधि आधारित शिक्षण विधि (क्रियापरक विधि) की विशेषताएँ। आदि के बारे में विस्तार से 👍 1. बाल-केन्द्रित शिक्षण उपागम (CHILD-CENTRED TEACHING APPROACH) प्राचीनकाल की शिक्षा शिक्षक केन्द्रित शिक्षा थी। शिक्षक जैसे चाहता था उसी प्रकार से शिक्षा देता था। इसमें बालक की अपेक्षा पाठ्यक्रम को अधिक महत्त्व दिया जाता था परन्तु शिक्षा में मनोविज्ञान के प्रवेश से बालक को महत्त्व दिया जाने लगा है। अब बालक की रुचियों, रुझानों तथा क्षमताओं को महत्त्व दिया जाने लगा है। पाठ्यक्रम के निर्धारण में भी इन बातों का ध्यान रखा जाता है। बाल-केन्द्रित शिक्षण का मुख्य उद्देश्य बालक का सर्वांगीण विकास करना है। बाल-केन्द्रित शिक्षण की विशेषताएँ (Characteristics of Child-C...

पावलव का सम्बद्ध प्रतिक्रिया का सिद्धान्त Pavlov ka sambaddh pratikriya ka siddhant

पावलव का अनुकूलित अनुक्रिया का सिद्धान्त ( I. P. PAVLOV'S CLASSICAL CONDITIONING THEORY) I. P. Pavlov : इनका पूरा नाम इवान पी. पावलव है। सम्बद्ध प्रतिक्रिया सिद्धान्त का प्रतिपादन रूसी मनोवैज्ञानिक आई. पी. पावलव ने किया था। इस सिद्धान्त को सम्बन्ध प्रत्यावर्तन का सिद्धान्त भी कहते हैं। इस मत के अनुसार-सीखना एक अनुकूलित अनुक्रिया है। बर्नार्ड के शब्दों में- अनुकूलित अनुक्रिया उत्तेजना की पुनरावृत्ति द्वारा व्यवहार का स्वचालन है जिसमें उत्तेजना पहले किसी विशेष अनुक्रिया के साथ लगी रहती है और अंत में वह किसी व्यवहार का कारण बन जाती है जो पहले मात्र रूप से साथ लगी हुई थी।"  यह माना जाता है कि उद्दीपक के प्रति अनुक्रिया करना (Stimulus-Response) मानव की प्रवृत्ति । जब मूल उद्दीपक के साथ एक नवीन उद्दीपक प्रस्तुत किया जाता है तथा कुछ समय पश्चात् जब मूल उद्दीपक को हटा दिया जाता है तब नवीन उद्दीपक से भी वही अनुक्रिया होती है जो मूल उद्दीपक से होती है। इस प्रकार अनुक्रिया नये उद्दीपक के साथ अनुकूलित हो जाती है।  यह प्रक्रिया पावलव द्वारा किये गये निम्नलिखित प्रयोग से स्पष्ट हो जाती है ...

उदाहरण प्रविधि(ILLUSTRATION TECHNIQUE) kya hai. उदाहरण प्रविधि ke prakar

8.  उदाहरण प्रविधि (ILLUSTRATION TECHNIQUE) उदाहरण बालक की विचार-शक्ति एवं कल्पना को जाग्रत कर उसके मानसिक विकास के प्रति सहायक होते हैं। उदाहरणों द्वारा अमूर्त विषय को मूर्त बनाया जाता है। इसके द्वारा बालकों के मस्तिष्क पर ज्ञान की अमिट छाप पड़ जाती है। यह विषय के विविध पक्षों का पारस्परिक सम्बन्ध समझने में असमर्थ होता है।  पिनसेण्ट के मतानुसार अच्छे उदाहरण दरूह कथन को सजीव एवं सरल बना देते हैं। तात्पर्य यह है कि उदाहरण विषय की क्लिष्टता को कम करते हैं। इनमें बालक के प्रत्यक्ष अनुभवों से सम्बन्ध होने के कारण विषय सरल तथा बोधगम्य बन जाता है। आमतौर से जब हम कोई गूढ़ बात करते हैं तो उसे स्पष्ट बनाने के लिए उदाहरणों का प्रयोग करते हैं। शिक्षण में उदाहरणों का प्रयोग करना एक कला है। विद्यालयों में पढ़ाये जाने वाले विषयों के शिक्षण में इनका प्रयोग आवश्यक होता है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पाठ्य-वस्तु की स्पष्टता, रोचकता, बोधगम्यता एवं मूर्तता की दृष्टि से उदाहरणों का प्रयोग बड़ा महत्त्वपूर्ण है । उदाहरण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं । 1. शाब्दिक उदाहरण— जैसे-दृष्टान्त, कहानी...